Tuesday, 11 June 2019

तन और आँच

                          न  और  आँच 






सर्दी  की  निष्ठुरता  ने,  अंग  को  मेरे  जमा  दिया          
रक्त  सुख  कर  बर्फ  बने,  धूप  याद सता  रहा 

निकली  जब  मै  छत , आँख  पड़ी  आँच की  तन पर 
लगा  छेड़ने  बढ़  बढ़ , वो  सभी  जगह से  घेर लिया 

कभी  मै  खुद पर छाँव  करती , तो कभी  एक  चद्दर तन लेती 
नहीं  माना  आँच  तनिक भी  , धिरे   धिरे  बढ़ता  रहा 


           वो  आँच  मुझे  सताता  रहा 
          वो  आँच  मुझे  जलाता   रहा 
           वो आँख  मुझे  दिखाता  रहा 


रे  बैरी  बस कर , अब जल कर  मैं  खाख  हुईं 
मेरे  सब्र का इन्ताह न ले ,  तुझ  तन लागे  मेघ  घड़ी 

साँझ  के तु जा लग जा ,मीन  के संग नीर भली 


         तेरा  मेरा  मेल नहीं 

        रे तेरा मेरा मेल नहीं  || 



                                                विनिता  पाण्डेय 







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